चमकती बिजलीयोंसे आंखे चकाचौंध, अवनत
रुद्रभीषण गर्जनासे मन भयकंपित
थंडी हवा के झोकोंसे तन पुलकित,
कैसी सुहानी ये बेमौसम बरसात, ये बेमौसम बरसात।
धूलभरी पत्तीया अब हरी भरी
पेडोंपे संजीवनी नयी नवेली
सुरज की फ़टकार अब प्यारभरी,
कैसी सुहानी ये बेमौसम बरसात, ये बेमौसम बरसात।
मन की उदासी से आंखे चार
कितना अनोखा है मनका व्यापार
अजनबी खुशीयोंकी हुई बौछार,
कैसी सुहानी ये बेमौसम बरसात, ये बेमौसम बरसात।
-वृंदा टिळक
कोलकाता (२७/०४/१० )
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